6.4.07

नेता हमारे

हमारे नेताओ की बत्तें है दुनिया से न्यारी,
इनके तो साथी है अत्याचार, शोषण और भूक्मारी॥

मतों के लिए तो इनकी मत मर जाती है,
जमीर मर जाते है इनके जब सत्ता हात आती है॥

धरम और जात के नाम पे हमे वोह भडकाते,
फिर भी किताबों में भाईचारे का पाठ पढाते॥

भुकों की प्यास और प्यासो की भूक ये भगाते,
ना जाने कितने अनगिनत इन्होने गले काटे॥

आम अदमिं इनके हाथों रोज बलि चढता है,
जन संख्या बहूत है तो क्या फरक पडता है॥

पता नही लोगों की ये नीन्द कब टूटेगी,
इन पिस्सूओ और जूओ से जान कब छूटेगी॥

लोगों के नसीब

मौसम बदलते है फूल खिलते है,
पल पल लोगों के नसीब बदलते है॥
कही मुस्कान तो कही आसूं झलकते है,
हरेक दर्दो के मरहम, थोडे ही मिलते है॥
सावन न होते ही कही बादल बरसते है,
कभी जोते हुए खेत भी बंजर रेह जाते है॥
सितारे भी अक्सर चांदनी में खो जाते है,
टिमटिमाते जुगनू भी कभी राहगार बन जाते है॥
कुदरत की अनोखी बतोओ को समझ नही पते है,
पता नही कैसे पत्थर भी पसीज जाते है॥

2.4.07

उमंग

फिजा से कोई नमी ना छिनो, ताजगी चली जायेगी...
सुबह से कोई लाली ना छिनो, खुबसुरती चली जायेगी...
फूल से कोई कोमलता ना छिनो, सादगी चली जायेगी...
मुझ से कोई सपने ना छिनो, उमंग चली जायेगी...

तरसते रहे

प्यार के बादल हमपे हमेशा बरसते रहे॥
फिर भी प्यार की एक बूँद के लिए तरसते रहे॥
भीग गए हम पुरे सिर से पैरो तक॥
फिर भी पिने के लिए तो तरसते रहे॥

चूहा

ये बात है बडी ही खास॥
रखना इसे तुम एक राज॥
कही दूर गए थे हम पांच॥

चेहरे के रंग लाल हो चुके थे॥
चल के हाल बेहाल हो चुके थे॥
क्योंकी बाहर चले हमे साल हो चुके थे॥

जगह थी तो बडी लाजवाब॥
पी हमने थोड़ी से शराब॥
पर चूहे ने करदी हमारी हालत खराब॥

खाना हमारा उसने पुरा चटका लिया॥
कभी याहा से तो कभी वहा से गट्का लिया॥
रात भर हमे उसने ऐसे ही लटका दिया॥

लाल बबूला होके हम उसे मारने निकले॥
चूहे के जगह हम ज़मीं को ही पीटे॥
क्या करे एक के दो दिख रहे थे होश खोके॥

रात भर यही कार्यक्रम हो रह था॥
हमारी नींद उडा कर चूहा दिन मैं आराम कर रहा था॥
किसी से कहना मात की एक चूहा हमपे भरी पड रहा था...[;)]